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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
ओड़िआ वैष्णव साहित्य में निर्गुणवादी चेतना
Authors
विष्णुप्रिया भुक्ता, डॉ स्नेहलता दास
Abstract
ओड़िआ साहित्य की वैष्णव परम्परा में निर्गुण तत्वों का एक समन्वित रूप देखने को मिलता है, जो भारतीय भक्तिधारा का एक महत्त्वपूर्ण अंश है। इस शोध-लेख में, ओड़िआ निर्गुण साहित्य के विकास में वैष्णव कवियों के योगदान पर विचार किया गया है। ओड़िआ साहित्य में निर्गुण और सगुण की धाराएँ परस्पर विरोधी न होकर समन्वित रूप से विकसित हुई हैं। सारला दास से लेकर पंचसखा के कवियों तथा उनके परवर्ती कवियों तक, निर्गुण ब्रह्म, शून्यवाद, अद्वैतवाद, पिंड-ब्रह्मांड, योग-साधना आदि अवधारणाएँ वैष्णव भक्ति साहित्य में अंतर्निहित हैं। इस अध्ययन में बौद्ध शून्यवाद, वेदान्त के अद्वैतवाद, नाथ-योग परम्परा के प्रभाव का विश्लेषण करने के साथ-साथ ओड़िआ वैष्णव कवियों ने जगन्नाथ, कृष्ण, राम जैसे सगुण अवतारों को किस प्रकार निर्गुण ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया है, इसका भी विश्लेषण किया गया है। ओड़िआ साहित्य के, ‘दांडी रामायण’, ‘भागबत’, ‘शून्य संहिता’, ‘ब्रह्मगीता’, ‘बिराटगीता’ जैसे भक्तिपरक ग्रंथों के उदाहरण के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि कैसे योग-साधना, उलट साधना, षड़चक्र, गुरु-तत्त्व, आत्मज्ञान जैसे निर्गुण तत्व ओड़िआ वैष्णव साहित्य के आधार रहे हैं।
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Pages:187-189
How to cite this article:
विष्णुप्रिया भुक्ता, डॉ स्नेहलता दास "ओड़िआ वैष्णव साहित्य में निर्गुणवादी चेतना". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 187-189
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