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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
विकास का मिथक और जन-विस्थापन व शोषण का यथार्थ: ‘डूब’ उपन्यास के संदर्भ में
Authors
जीतबाला
Abstract
कृषक जीवन की त्रासदी, महानगरीय जीवन की जटिलताओं व औद्योगीकरण और बड़ी - बड़ी परियोजनाओं के कारण विकास के स्थान पर जन -विस्थापन व शोषण जैसे सामाजिक यथार्थों को चित्रित करने वाले समकालीन उपन्यासकारों में वीरेंद्र जैन का नाम बड़ी प्रमुखता से लिया जाता है। उनका उपन्यास 'डूब' भी विकास के सब्जबाग दिखाकर विस्थापित व शोषित किए गए ग्रामीणों की व्यथा का जीवंत दस्तावेज है, जिसमें लड़ैई गाँव में बनाए गए बांध के प्रभावों को संवेदनशील तरीके से चित्रित किया गया है। उपन्यास में दर्शाया गया है कि विकास परियोजनाओं की आड़ में कुछ पूंजीपतियों व सरकार के लाभ के लिए ग्रामीणों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण कम मूल्य पर किया जाता है व निर्धारित मूल्य में से भी भ्रष्ट नौकरशाही हड़पने का प्रयास करती है। आजीविका का साधन (जमीन) समाप्त होने के कारण ग्रामीण अपना गाँव त्याग कर दूसरे स्थान पर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह विस्थापन केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं है बल्कि अपनी संस्कृति, परंपराओं, सामाजिक संबंधों व अस्तित्व पहचान से भी विस्थापित होना है। विकास के  नाम पर किया जाने वाला यह जन -विस्थापन व शोषण एक अदृश्य अन्याय है। विकास के लिए आवश्यक बताए जाने वाली परियोजना ग्रामीणों के अस्तित्व विनाश व शोषण का कारण बन जाती है।
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Pages:159-161
How to cite this article:
जीतबाला "विकास का मिथक और जन-विस्थापन व शोषण का यथार्थ: ‘डूब’ उपन्यास के संदर्भ में". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 159-161
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