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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ में पाप, पुण्य और प्रेम की अवधारणा का पुनर्पाठ
Authors
दिनेश, डॉ. कल्पना
Abstract
मानव जीवन का उद्देश्य कोई निर्धारित नहीं कर पाया और न ही यह स्पष्ट हो पाया है कि मानव जीवित क्यों और कैसे है और न केवल जीवित अपितु संसार में उपस्थित अन्य सभी प्राणियों से अधिक उन्नत, अधिक संवेदनशील, अधिक सभ्य। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार ये सब करोड़ों वर्षो के संघर्ष और खुद को बेहतर करते जाने का परिणाम है, ईश्वर को सर्वेसर्वा मानने वालों के अनुसार ये परमपिता की कृपा है, कुछ दार्शनिकों के अनुसार यह बस एक सुखद संयोग है, इन सब मत मतान्तरों के बीच एक मत साहित्यकार रखते आये हैं वो है; प्रेम। मानव की उन्नति, जीवन का कारण और उद्देश्य प्रेम ही है। मानव की संवेदनशीलता और अपने पराये की भावना से रहित होकर प्राणी मात्र से प्रेम कर पाने की क्षमता ही मानव को अन्य सब जीवों से अलग करती है। प्रेम की व्याख्या विद्वान अपने अपने अनुसार करते रहते हैं। प्रेम की विराटता स्वयं स्पष्ट है ऐसा ही एक और प्रश्न जो प्रेम के साथ साथ लगा चलता है और जीवन की यात्रा को हर कदम पर प्रभावित करता है; पाप और पुण्य।
जब मानव ने अपनी पाश्विक प्रवृत्ति को छोड़कर समाज का निर्माण किया तो उसने सबसे पहले स्वयं की पशुता पर बंधन लगाने के लिए कुछ नियम निर्धारित किये जिस से सभ्य समाज का निर्माण हो सके। आरंभिक स्तर पर प्रत्येक समाज ने अपनी भौगोलिक स्थिति के साथ सामंजस्य रखते हुए ये नियम बनाये, समय के साथ जब सभ्यताएं उन्नत हुईं मानव की भावनाएं ज्यादा जटिल होने लगी तो नए सामाजिक नियमों की आवश्यकता अनुभव हुई जिन्हें अधिक दृढ़ता से लोगों के मानस में बैठाने के लिए उन्हें अध्यात्म से जोड़ा गया और नाम दिया गया पाप और पुण्य का। एक ऐसी सामाजिक प्रणाली तैयार की गयी जो सहज ही कुछ कार्यों के करने या न करने से किसी को समाज में प्रशंसा या घृणा का पात्र बना सकती थी। इस प्रणाली के साथ भी वही अनहोनी हुई जो प्रत्येक पंथ, सम्प्रदाय और विचारधारा के साथ होती आयी है; जड़ता। ये नियम समय के साथ विकसित होने के स्थान पर रूढ़ होने लगे। मनुष्य की प्रवृत्ति बदली किन्तु नियम जड़ हो गए। मानव स्वभाव से ही प्रगतिशील ्है जड़ता उसे अधिक दिन नहीं सुहाती उसने इन नियमों, रूढ़ियों की नई व्याख्या तलाश करनी आरम्भ की नए संदर्भों में नए सिरे से इनका मूल्यांकन आरम्भ हुआ। भगवती चरण वर्मा जी ने भी अपने उपन्यास चित्रलेखा में इस पाप, पुण्य और प्रेम की व्याख्या अपने सिरे से आरंभ की। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वर्मा जी ने उक्त विषयों सम्बन्धी अपनी मान्यताएं इस उपन्यास के माध्यम से प्रस्तुत की है। चित्रलेखा के सन्दर्भ में इन विषयों का पुनर्मूल्यांकन इस शोध पत्र में प्रस्तुत किया जा रहा है।
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Pages:151-153
How to cite this article:
दिनेश, डॉ. कल्पना "भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ में पाप, पुण्य और प्रेम की अवधारणा का पुनर्पाठ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 151-153
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