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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
हिंदी कहानियों का शिल्प और पर्यावरणीय संवेदना: मानव-प्रकृति संबंध की सतत व्याख्या
Authors
श्वेता पारीक , निर्मला राव
Abstract
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी भारतीय समाज के बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति रही है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य हिंदी कहानियों के शिल्प-विधान के माध्यम से व्यक्त पर्यावरणीय संवेदना तथा मानव–प्रकृति संबंध की व्याख्या करना है। इस अध्ययन में गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए चयनित कहानियों का पाठ-विश्लेषण किया गया है। यह पाया गया कि हिंदी कहानियों में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय संवेदनात्मक और वैचारिक तत्व के रूप में उपस्थित है। कथा-संरचना, भाषा, प्रतीक एवं कथन-तकनीक के माध्यम से पर्यावरणीय संकट, सह-अस्तित्व और सतत विकास की अवधारणाएँ प्रभावी रूप से अभिव्यक्त होती हैं। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि हिंदी कहानी का शिल्प पर्यावरणीय चेतना को गहन बनाने और सतत भविष्य की दिशा में सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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Pages:156-158
How to cite this article:
श्वेता पारीक , निर्मला राव "हिंदी कहानियों का शिल्प और पर्यावरणीय संवेदना: मानव-प्रकृति संबंध की सतत व्याख्या". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 156-158

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हिंदी कहानियों का शिल्प और पर्यावरणीय संवेदना: मानव-प्रकृति संबंध की सतत व्याख्या | International Journal of Hindi Research