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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
वैश्वीकरण और सांस्कृतिक संकट के संदर्भ में रामचरितमानस की प्रासंगिकता
Authors
डॉ. राखी सोराठिया
Abstract
वैश्वीकरण ने विश्व को आर्थिक और तकनीकी स्तर पर निकट अवश्य लाया है, किन्तु इसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक विखण्डन, उपभोक्तावाद, पारिवारिक मूल्यों का क्षरण तथा नैतिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ भी तीव्र हुई हैं। भारतीय समाज भी इस सांस्कृतिक संक्रमण से अछूता नहीं रहा। ऐसी परिस्थिति में भारतीय ज्ञान-परम्परा के उन ग्रन्थों का पुनर्पाठ आवश्यक हो जाता है, जो मानव जीवन को नैतिकता, लोकधर्म और सामाजिक मर्यादा से जोड़ते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस इसी दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
प्रस्तुत शोध-पत्र में वैश्वीकरण से उत्पन्न सांस्कृतिक संकट के संदर्भ में रामचरितमानस की प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में तुलसीदास द्वारा प्रतिपादित लोकमंगल, पारिवारिक आदर्श, सामाजिक समरसता, नैतिक अनुशासन तथा सांस्कृतिक एकात्मता के तत्त्वों का विवेचन किया गया है। शोध से स्पष्ट होता है कि रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवन्त दस्तावेज है। वर्तमान समय में यह ग्रन्थ सांस्कृतिक अस्मिता, मानवीय संवेदना तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की पुनर्स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान करता है।
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Pages:180-183
How to cite this article:
डॉ. राखी सोराठिया "वैश्वीकरण और सांस्कृतिक संकट के संदर्भ में रामचरितमानस की प्रासंगिकता ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 180-183
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