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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
गिर्दा के जनगीत ‘जैंता एक दिन तो आलो’ में उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक परिवर्तन की चेतना
Authors
डॉ. निधि उप्रेती
Abstract
उत्तराखंड के जनकवि गिर्दा (गिरीश तिवारी) का साहित्य लोकजीवन, जनसंघर्ष और सांस्कृतिक अस्मिता का सशक्त दस्तावेज है। उनकी कुमाऊँनी रचना “जैंता एक दिन तो आलो” उत्तराखंड की सामूहिक चेतना, सामाजिक आकांक्षाओं और सांस्कृतिक स्मृति का प्रतिनिधि जनगीत है। यह गीत केवल भविष्य के प्रति आशा का स्वर नहीं, बल्कि सामाजिक विषमता, अन्याय और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध का सांस्कृतिक घोष भी है। प्रस्तुत शोध-पत्र में इस गीत का पाठ-विश्लेषण करते हुए उसमें निहित लोकसंस्कृति, जनभाषा और सामाजिक चेतना का अध्ययन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि गिर्दा की यह रचना लोकजीवन की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हुए एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज की कल्पना प्रस्तुत करती है। गीत में प्रयुक्त कुमाऊँनी भाषा उसकी सांस्कृतिक प्रामाणिकता को सुदृढ़ बनाती है तथा उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति को संरक्षित करने का कार्य करती है। इस प्रकार यह गीत लोकभाषा, लोकसंस्कृति और जनचेतना के त्रिवेणी-संगम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
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Pages:204-206
How to cite this article:
डॉ. निधि उप्रेती "गिर्दा के जनगीत ‘जैंता एक दिन तो आलो’ में उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक परिवर्तन की चेतना". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 204-206
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