ARCHIVES
VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
रेणु के रिपोर्ताज में आंचलिकता : एक अध्ययन
Authors
विकास रंजन, डॉ रोशन रवि
Abstract
हिंदी साहित्य की कथेतर गद्य विधाओं के अंतर्गत रिपोर्ताज एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधा है, जो पत्रकारिता की वस्तुनिष्ठता और साहित्य की कलात्मक संवेदनशीलता के अद्भुत समन्वय से सामाजिक यथार्थ को रूपायित करती है। प्रस्तुत शोध पत्र में स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आंचलिक रचनाकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' के रिपोर्ताज साहित्य में अंतर्निहित आंचलिक चेतना के विविध आयामों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। रेणु ने 'अंचल' को मात्र एक सीमित भौगोलिक सीमा के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत, धड़कती हुई सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अध्ययन के अंतर्गत उनके प्रमुख रिपोर्ताज संग्रहों—विशेष रूप से 'ऋण जल धन जल' तथा 'नेपाली क्रांति कथा' के पाठ-विश्लेषण के माध्यम से यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़ एवं सूखा) तथा राजनीतिक जन-आंदोलनों के बीच भी अंचल की लोक-संस्कृति, उत्सवधर्मिता, और विशिष्ट भाषाई संरचना अक्षुण्ण बनी रहती है। शोध निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि रेणु का रिपोर्ताज लेखन 'परकाया प्रवेश' या किसी तटस्थ पत्रकार की शुष्क रिपोर्टिंग नहीं है, बल्कि वह स्वयं उनके द्वारा गहरे भोगे हुए और स्वानुभूत यथार्थ की एक प्रामाणिक साहित्यिक गवाही है। समकालीन दौर में जहाँ मुख्यधारा का मीडिया ज़मीनी यथार्थ और लोक-संवेदनाओं से विमुख हो रहा है, वहाँ रेणु का सामाजिक सरोकारों से संपृक्त रिपोर्ताज साहित्य अपनी संवेदनात्मक सघनता के कारण आज भी बेहद प्रासंगिक और दिशा-निर्देशक है।
Download
Pages:61-63
How to cite this article:
विकास रंजन, डॉ रोशन रवि "रेणु के रिपोर्ताज में आंचलिकता : एक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 61-63
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

