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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
हिंदी और मराठी स्त्री आत्मकथाओं में पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती : रमणिका गुप्ता कृत 'हादसे' / 'आपहुदरी' और मलिका अमर शेख कृत 'मैं बरबाद होना चाहती हूँ' के विशेष संदर्भ में
Authors
उषा रानी, डॉ. कल्पना
Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र हिंदी और मराठी की दो चर्चित स्त्री आत्मकथाओं - रमणिका गुप्ता कृत 'हादसे' एवं 'आपहुदरी' और मलिका अमर शेख कृत 'मैं बरबाद होना चाहती हूँ' में पितृसत्तात्मक व्यवस्था को दी गई चुनौती का तुलनात्मक विश्लेषण करता है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन की सच्ची घटनाओं को लिखता है। जब एक स्त्री अपनी आत्मकथा लिखती है तो वह केवल अपनी कहानी नहीं लिखती, बल्कि उन सभी स्त्रियों की सामूहिक पीड़ा को भी वाणी देती है जो समाज में घुट-घुट कर जीती हैं। इस शोध का उद्देश्य यह समझना है कि समाज में व्याप्त पितृसत्ता यानी पुरुष वर्चस्व को इन दोनों लेखिकाओं ने किस प्रकार चुनौती दी है।
अध्ययन में यह पाया गया कि दोनों लेखिकाओं का संघर्ष अलग-अलग धरातल पर है। रमणिका गुप्ता की लड़ाई बाहर की दुनिया से है, जहाँ वे सामंती परिवार की रूढ़ियों को तोड़कर मजदूर आंदोलन और राजनीति में अपनी पहचान बनाती हैं। वहीं, मलिका अमर शेख की लड़ाई घर के भीतर की है, जहाँ वे यह उजागर करती हैं कि बाहर से क्रांतिकारी दिखने वाला पुरुष भी घर के अंदर किस प्रकार शोषक बन सकता है। दोनों लेखिकाओं ने समाज द्वारा निर्मित 'आदर्श नारी', लज्जा और त्याग के पारम्परिक मानदंडों को अस्वीकार कर अपनी देह, इच्छा और अस्मिता पर स्वयं के अधिकार का दावा किया है। निष्कर्षतः यह शोध स्थापित करता है कि 'आपहुदरी' और 'बरबाद' जैसे नकारात्मक शब्दों को ही इन लेखिकाओं ने अपनी स्वतंत्रता का प्रतीक बना लिया है।
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Pages:99-101
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उषा रानी, डॉ. कल्पना "हिंदी और मराठी स्त्री आत्मकथाओं में पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती : रमणिका गुप्ता कृत 'हादसे' / 'आपहुदरी' और मलिका अमर शेख कृत 'मैं बरबाद होना चाहती हूँ' के विशेष संदर्भ में". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 99-101
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