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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
सांस्कृतिक चेतना और सामासिक संस्कृति : नज़ीर की कविता का आत्मीय पाठ
Authors
डॉ. आलोक कुमार सिंह
Abstract
प्रस्तुत शोध-आलेख नज़ीर अकबराबादी की कविता के आत्मीय पाठ के जरिए उसमें निहित सांस्कृतिक चेतना और सामासिक संस्कृति की पड़ताल करता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल मुख्य रूप से रीतिपरक शास्त्रीयता, राज्याश्रय और विलासिता का युग रहा है। ऐसे दौर में नज़ीर अकबराबादी ने दरबारी चमक-दमक और सामंती प्रस्तावों को दरकिनार कर आम अवाम के जीवन, उनके संघर्षों और लोक-उत्सवों को अपनी काव्य-संवेदना का केंद्र बनाया। यह आलेख रेखांकित करता है कि नज़ीर की कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी (सामासिक) संस्कृति और जन-साधारण की आत्मीयतापूर्ण सांस्कृतिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। वे जितने चाव से इस्लामी पर्वों का वर्णन करते हैं, उतनी ही श्रद्धा से हिंदू देवी-देवताओं (कृष्ण, महादेव) और त्यौहारों (होली, दीवाली, रक्षाबंधन) पर भी लेखनी चलाते हैं। भाषा के स्तर पर भी उन्होंने अरबी-फ़ारसी के साथ ब्रज, खड़ी बोली और लोक-शब्दावली का अनूठा सामासिक संयोजन किया है। अंततः, यह आलेख हिंदी साहित्य के इतिहासलेखन में नज़ीर अकबराबादी की स्थिति की समीक्षा करते हुए समकालीन सांप्रदायिक विसंगतियों के दौर में उनके काव्य को अकादमिक पाठ्यक्रम में शामिल करने की उपचारात्मक आवश्यकता पर बल देता है।
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Pages:128-132
How to cite this article:
डॉ. आलोक कुमार सिंह "सांस्कृतिक चेतना और सामासिक संस्कृति : नज़ीर की कविता का आत्मीय पाठ ". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 128-132
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