ARCHIVES
VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
उड़िया और हिंदी की प्रगतिवादी कविता का तुलनात्मक अध्ययन
Authors
अमिय कुमार साहु
Abstract
बीसवीं शताब्दी के तीसरे-चौथे दशक में भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में एक साथ एक नई चेतना का उदय हुआ, जिसे “प्रगतिवाद” या “प्रगतिशील आंदोलन” के नाम से जाना जाता है। यह आंदोलन केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बांग्ला, उर्दू, मराठी, तमिल और उड़िया जैसी भाषाओं में भी लगभग समान समय में इसकी लहर पहुँची। इसका मूल कारण उस समय का सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिवेश था — औपनिवेशिक शासन का दमन, 1930 के दशक की आर्थिक मंदी, किसानों-मजदूरों की दुर्दशा, तथा रूसी क्रांति और मार्क्सवादी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव। इन परिस्थितियों ने साहित्यकारों को यथार्थ के धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया और कल्पना-प्रधान, वैयक्तिक भावनाओं से भरी रोमानी कविता के स्थान पर समाज, वर्ग-संघर्ष और जनजीवन को केंद्र में रखने वाली कविता का सूत्रपात हुआ।
हिंदी और उड़िया दोनों भाषाओं में प्रगतिवादी काव्य-धारा का उद्भव लगभग समकालिक रहा, परन्तु दोनों की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठनात्मक स्वरूप और साहित्यिक परिणतियों में महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ भी दिखाई देती हैं। तुलनात्मक साहित्य के दृष्टिकोण से यह अध्ययन इसलिए भी सार्थक है कि यह दिखाता है कि किस प्रकार एक ही वैचारिक प्रेरणा (मार्क्सवाद और अंतरराष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक आंदोलन) क्षेत्रीय सामाजिक यथार्थ के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुई। प्रस्तुत शोध-पत्र में हिंदी और उड़िया प्रगतिवादी कविता की पृष्ठभूमि, प्रमुख कवियों, काव्य-प्रवृत्तियों तथा भाषा-शैली का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
Download
Pages:133-137
How to cite this article:
अमिय कुमार साहु "उड़िया और हिंदी की प्रगतिवादी कविता का तुलनात्मक अध्ययन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 133-137
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

