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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
वृद्ध अस्मिता और हिंदी उपन्यास: ‘गिलिगडु’ और ‘रेहन पर रग्घू’
Authors
एस.वी.एस.एस. नारायण राजू
Abstract
समकालीन हिंदी साहित्य में वृद्ध-विमर्श तेजी से उभरता हुआ एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक-साहित्यिक विमर्श है, जो बदलते पारिवारिक संबंधों, सामाजिक संरचना, भूमंडलीकरण, नगरीकरण, उपभोक्तावाद तथा व्यक्तिवादी जीवन-दृष्टि के संदर्भ में वृद्धजनों की स्थिति का विश्लेषण करता है. भारतीय समाज में वृद्ध व्यक्ति परंपरागत रूप से अनुभव, ज्ञान, संस्कार और पारिवारिक मार्गदर्शन का केंद्र रहा है, किंतु संयुक्त परिवार के विघटन तथा आधुनिक जीवन-शैली के प्रभाव से उसकी सामाजिक भूमिका और पारिवारिक महत्ता में निरंतर परिवर्तन आया है. प्रस्तुत आलेख में चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘गिलिगडु’ तथा काशीनाथ सिंह के ‘रेहन पर रग्घू’ के विशेष संदर्भ में वृद्धावस्था से जुड़ी भावनात्मक उपेक्षा, अकेलापन, संवादहीनता, पारिवारिक विघटन, संपत्ति-बोध, उपयोगितावादी मानसिकता, असुरक्षा तथा आत्मसम्मान के संकट का विश्लेषण किया गया है. ‘गिलिगडु’ के बाबू जसवंत सिंह और कर्नल स्वामी जैसे पात्र यह स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक सम्पन्नता और परिवार की उपलब्धता भी वृद्ध व्यक्ति के भावनात्मक अकेलेपन को समाप्त नहीं कर पाती. वहीं ‘रेहन पर रग्घू’ बदलते पारिवारिक मूल्यों और पीढ़ीगत संबंधों के बीच वृद्ध जीवन की विडंबनाओं को उजागर करता है. दोनों उपन्यास वृद्धावस्था को केवल जैविक अवस्था न मानकर मानवीय गरिमा, अस्मिता, आत्मीयता और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा गंभीर प्रश्न बनाते हैं.
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Pages:147-151
How to cite this article:
एस.वी.एस.एस. नारायण राजू "वृद्ध अस्मिता और हिंदी उपन्यास: ‘गिलिगडु’ और ‘रेहन पर रग्घू’". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 147-151
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