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VOL. 2, ISSUE 2 (2016)
साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी साहित्य के विकास में ’हंस’ पत्रिका का योगदान
Authors
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
1986 में ’हंस’ पत्रिका का पुनर्प्रकाशन हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी साहित्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के लिए यह समय बड़ा निर्णायक और नाजुक था। साहित्य के लिए यह रचनाकारों की अस्सी की पीढ़ी की पहचान का समय था और साहित्यिक पत्रकारिता के लिए यह अत्यंत संकट का दौर था। बड़े-बड़े प्रकाशन संस्थानों और व्यावसायिक घरानों की पत्रिकाएं ’साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ और ’धर्मयुग’ अवसान की ओर थीं, ’कल्पना’, ’नई कहानियां’, ’कहानी’ और ’दिनमान’ जैसी पत्रिकाएं विदा ले चुकी थीं। यह वही दौर था जब दूरदर्शन के धार्मिक और तिलस्मी ऐय्यारी धारावाहिकों में भारतीय जनमानस मग्न था। बाजार में लग्जरी उत्पादों की आवक आम होने लगी थी, महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ रही थी। राजनीतिक रूप से भी नए समीकरण बन रहे थे। कुल मिलाकर साहित्य और समाज का परिदृश्य संवेदनशील था।
ऐसे समय में ’हंस’ ने साहित्य में लोगों के विश्वास को बनाये रखने का काम किया। घनघोर मनोरंजन के इस दौर में भी साहित्यिक सरोकारों के प्रति लोगों को सचेत करने का काम ’हंस’ ने किया। दूरदर्शन की चकाचौंध और प्रिंट मीडिया के विदाई के दौर में ’हंस’ ने साहित्यिक पत्रकारिता की लौ को जलाए रखा और हिन्दी पट्टी के बौद्धिक परिवेश को गड्डमड्ड होने से बचाया।
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Pages:40-42
How to cite this article:
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी साहित्य के विकास में ’हंस’ पत्रिका का योगदान". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 2, 2016, Pages 40-42
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