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VOL. 2, ISSUE 3 (2016)
हिन्दी साहित्य में रचना-प्रक्रिया और लेखकीय सजगता के प्रश्न
Authors
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य
Abstract
रचना साहित्यकार की विशिष्ट कल्पना प्रक्रिया का परिणाम है। रचना-प्रक्रिया कलाकार के मस्तिष्क में घटने वाली आन्तरिक प्रक्रिया से सम्बद्ध होती है जिसके द्वारा एक रचना अन्तरंग से बहिरंग कलेवर धारण करती है। रचना-प्रक्रिया का प्रश्न अब हिन्दी आलोचना के लिए नया नहीं है। किसी रचना की संपूर्ण सृजनात्मक प्रक्रिया का अध्ययन अब हिन्दी आलोचना में स्वीकृत हो चुका है। “रचना-प्रक्रिया रचनात्मक अनुभूति की प्रक्रिया है।“¹ इसका संबंध रचनाकार की संपूर्ण चेतना से है। रचनाकार अपनी अनुभूति के चरम उद्वेग-क्षण में रचना को अभिव्यक्त करने के लिए जिन माध्यमों को प्रयुक्त करता है वे सभी रचना-प्रक्रिया के उपादान होते हैं। इसमें रचनाकार की अनुभूति और संवेदना से लेकर उनकी अभिव्यक्ति-तक के सारे उपादान शामिल होते हैं। कल्पना रचना-प्रक्रिया की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवस्था है। यही रचना-प्रक्रिया का आधार है, इसी पर सर्जक अभिव्यंजना से पूर्व तैयारी करता है। यहीं पर वह रचना के शिल्प को गढ़ता है, उसमें रंग भरता है, यहीं पर सर्जक अभिव्यक्ति से पूर्व रचना के नए संसार को बहुत संजीदगी से साज-संवार लेता है, जांच-परख लेता है।
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Pages:62-64
How to cite this article:
डॉ. संगीता गोगिया, डॉ. नन्दकिशोर मौर्य "हिन्दी साहित्य में रचना-प्रक्रिया और लेखकीय सजगता के प्रश्न". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 3, 2016, Pages 62-64
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