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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 4, ISSUE 5 (2018)
आधुनिक काल के उपन्यासों में दलित विमर्श
Authors
डाॅ0 तबस्सुम खान, विनीता कुमारी शर्मा
Abstract
हिन्दी उपन्यासों में दलित समाज की सामाजिक दशा और दिशा का वास्तविक रूप मिलता है। उनकी आर्थिक तंगी, रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष, उच्चवर्गीय समाज का बढ़ता अन्याय अत्याचार। इसी के साथ-साथ इक्कीसवीं सदी में दलित अपने उपर होने वाले अन्यायों का प्रतिकार करने लगा है। अपनी सामाजि सुरक्षा हेतु कानून का सहारा लेने लगा है। अपने सामाजिक विकास के लिए शिक्षा ग्रहन कर रहा है। फिर भी समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पा रहा है। इसकी वजह वो सरकार से सवाल पूछने लगा है। हम यहाँ के ही मूल रहवासी होने के बावजूद भी समाज में खेतों का समान बँटवारा नहीं होता तबतक सामाजिक समानता नहीं आएगी। और ना ही दलितों की रोटी की चिंता मिट पाएगी। अतः दलित विमर्श में दलित को केंद्र में रखकर जो बहस हुई है उससे दलित समाज को अपनी पीड़ा, दुःख, दर्द का अहसास होगा। उनमें नई चेतना जाग उठेगी। और वह अपनी मुश्किलों को डटकर सामना करेगा और विकास कि पथ पर जाता हुआ नजर आएगा। इक्कीसवीं सदी के उपन्यासों का इससे बड़ा दलितोंको योगदान और क्या हो सकता है।
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Pages:22-23
How to cite this article:
डाॅ0 तबस्सुम खान, विनीता कुमारी शर्मा "आधुनिक काल के उपन्यासों में दलित विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 5, 2018, Pages 22-23
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