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VOL. 7, ISSUE 1 (2021)
तुलसीदास निरूपित मानव-धर्म की आचार-संहिता
Authors
डॉ. आशा पाण्डेय
Abstract
विश्व प्रसिद्ध महाकवि गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्याकाश का चमकता हुआ पूर्णमासी का वह चंद्र हैं, जो सहृदय को शीतलता और अमृत से परिपूरित करता है। हिंदी साहित्य-जगत् में “सूर सूर तुलसी ससि” – उक्ति प्रचलित है, इससे सहमत हुआ जा सकता है। तुलसीदास रचित साहित्य परिमाण, भाव-विषय वैविध्य, काव्यरूपों और भाषा-शैली में अद्वितीय है। तुलसीदास भक्तिकाल में प्रचलित भक्ति के विभिन्न स्वरूपों, मतों, वादों, दर्शनों, पद्धतियों, अभिव्यक्ति-शैलियों के विवादों से ऊपर उठ उनमें समन्वय के पक्षपाती रहे हैं। उनका साहित्य अर्थ-गांभीर्य, भाव-सरसता, प्रभावशीलता, काव्य-सौष्ठव एवं अभिव्यंजना कौशल में अपना सानी नहीं रखता है। तुलसी का साहित्य ‘नानापुराणनिगमागमसम्मतं’, शास्त्रों और ग्रंथों का निचोड़ होकर भी लोकसंग्रह और मौलिकता से संपन्न है। ‘स्वान्तः सुखाय’ लिखा गया उनका साहित्य ‘सर्वजन हिताय’, लोकमंगलकारी सिद्ध हुआ और वह व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ता गया। उनकी भक्ति में लोकरंजक रूप भी विद्यमान है तथा वह लोक धर्म और लोक मर्यादा के प्रति भी सचेत है। तुलसीदास धर्म, संस्कृति और साहित्य की अभिनव, अनुपम त्रिवेणी हैं। उन्होंने सदियों से चली आ रही ‘रामकथा’ को ‘भाषानिबद्ध’ कर जन-जन तक पहुँचाया। उनके आराध्य राम परब्रह्म भी हैं और अवतारी मानव भी है। वे मानवीय करुणा से परिपूरित ‘गरीबनिवाज’ हैं, ‘शरणागत वत्सल हैं, दुष्टहंता हैं, धर्मसंरक्षक हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम और अत्यंत विनम्र भी हैं। उसमें शक्ति-शील-सौंदर्य का अद्भुत सम्मिश्रण है। तुलसीकृत महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ विश्वप्रसिद्ध ग्रंथों में सम्मिलित है। ‘मानस’ में मानवरूप धारी राम वनवास के दौरान अपने लिए उचित निवास स्थान की जिज्ञासा वाल्मीकि ऋषि के समक्ष प्रकट करते हैं। ऋषि ने जो स्थान बताएँ, वे आज भी मानवों के लिए प्रासंगिक हैं, यह लेख तुलसीदास लिखित मानवधर्म की आचार- संहिता के संदर्भ में हैं।
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Pages:16-22
How to cite this article:
डॉ. आशा पाण्डेय "तुलसीदास निरूपित मानव-धर्म की आचार-संहिता". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 1, 2021, Pages 16-22
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