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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
हिंदी-ओड़िआ लोकोक्तियों में रामकथा का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
Authors
मौसम तिवारी
Abstract
प्रस्तुत शोध-आलेख हिंदी और ओड़िआ भाषाओं की उन लोकोक्तियों का तुलनात्मक सांस्कृतिक अध्ययन है, जिनमें रामकथा के विविध पात्र राम, सीता, लक्ष्मण, रावण, विभीषण आदि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उपस्थित हैं तथा रामकथा विविध सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों के साथ अभिव्यक्त हुई है। रामकथा भारतीय लोकसंस्कृति में केवल एक महाकाव्यात्मक आख्यान नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक चेतना की आधारशिला के रूप में प्रतिष्ठित है। लोकोक्तियों के माध्यम से रामकथा का लोकांतरण यह दर्शाता है कि भारतीय समाज ने इस कथा को शास्त्रीय स्तर से उठाकर जनजीवन के व्यवहारिक स्तर पर आत्मसात कर लिया है।
इस अध्ययन में हिंदी और ओड़िआ लोकोक्तियों का वर्णनात्मक एवं विवेचनात्मक विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों भाषाएँ एक ही सांस्कृतिक स्रोत से पोषित होने के बावजूद अपने-अपने सामाजिक अनुभवों के अनुसार भिन्न अभिव्यक्तियाँ विकसित करती हैं। हिंदी लोकोक्तियाँ अपेक्षाकृत सूत्रात्मक, नैतिक और दार्शनिक स्वरूप की हैं, जबकि ओड़िआ लोकोक्तियाँ अधिक कथात्मक, प्रसंगप्रधान और सामाजिक यथार्थ से जुड़ी हुई हैं। रावण और लंका से संबंधित लोकोक्तियाँ अहंकार और पतन की चेतावनी देती हैं, वहीं सीता से जुड़ी लोकोक्तियाँ त्याग, पीड़ा और सामाजिक अन्याय को उजागर करती हैं।
भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण से यह शोध सिद्ध करता है कि रामकथा आधारित लोकोक्तियाँ धर्म, कर्म, मर्यादा और लोकन्याय की अवधारणाओं को जनभाषा में प्रभावी रूप से संप्रेषित करती हैं। साथ ही, आधुनिक सामाजिक संदर्भों-सत्ता, संगठनात्मक राजनीति और स्त्री-विमर्श में भी इन लोकोक्तियों की प्रासंगिकता स्पष्ट होती है। इस प्रकार, यह अध्ययन हिंदी-ओड़िआ तुलनात्मक लोकसंस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन वर्णनात्मक, तुलनात्मक तथा सांस्कृतिक विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है।
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Pages:288-290
How to cite this article:
मौसम तिवारी "हिंदी-ओड़िआ लोकोक्तियों में रामकथा का सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 288-290
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