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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
लोक-संस्कृति में प्रकृति तत्वों की उत्पत्ति और सर्जना का महत्व (नदियाँ, पर्वत, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी)
Authors
Thankam S
Abstract
हिंदी लोक-संस्कृति में प्रकृति को केवल भौतिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवनदायिनी, पूजनीय और आध्यात्मिक सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया है। नदियाँ, पर्वत, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी भारतीय जनजीवन के अभिन्न अंग हैं, जिनका उल्लेख लोक-विश्वासों, पौराणिक कथाओं और धार्मिक परंपराओं में व्यापक रूप से मिलता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि किस प्रकार लोक-संस्कृति ने प्रकृति तत्वों को देवी-देवताओं से जोड़कर उनके संरक्षण और संतुलन की भावना विकसित की। नदियों को मातृस्वरूपा, पर्वतों को स्थिरता और तपस्या का प्रतीक, वृक्षों को जीवन और पवित्रता का आधार तथा पशु-पक्षियों को सह-अस्तित्व और जैव-संतुलन का संवाहक माना गया है। लेख में पौराणिक, लोक-सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति और मानव का संबंध परस्पर आश्रित और सहजीवी है। समकालीन पर्यावरण संकट के संदर्भ में हिंदी लोक-संस्कृति का यह दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध होता है, क्योंकि यह संरक्षण, संतुलन और सामंजस्य का संदेश देता है।
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Pages:138-140
How to cite this article:
Thankam S "लोक-संस्कृति में प्रकृति तत्वों की उत्पत्ति और सर्जना का महत्व (नदियाँ, पर्वत, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी)". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 138-140
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