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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
मध्यकालीन संत साहित्यरू त्याग और संगत की महत्ता
Authors
महिपाल सिंह
Abstract
संत साहित्य का आविर्भाव उसी समय हुआ जब देश में मुसलमानों का आक्रमण हो रहा था। संतों ने इसका विरोध न करके एकेश्वरवादी भावना के माध्यम से नवजागरण एवं स्वावलंबन को जगाने का प्रयास समाज में किया जिससे समाज में सामूहिक मनोवृति का झुकाव लोकोन्मुख हो गया। दादूपंथ ने हिंदू-मुस्लिम वर्गों की दृष्टि से परे एक होने का मार्ग प्रस्तुत किया। संत साहित्य में त्याग और समर्पण को अलग करना मुश्किल है। संतों का समर्पण से आशय किसी वस्तु या विकार को त्यागकर अन्य पर न्योछावर करना है। जबकि त्याग में उसे किसी वस्तु को न्योछावर करने की आवश्यकता नहीं है। त्याग में केवल उसे छोड़ना है। त्याग में किसी वस्तु या विचार की चिंता किए बगैर निश्चित हो जाना हैं जबकि समर्पण में उसकी चिंता ईश्वर या गुरु को रहती है। समर्पण में पूर्ण निष्ठा एवं प्रेम तत्व की अधिकता रहती है। त्याग में स्वानुभूति एवं आत्मचिंतन, चित्तशुद्धि या आत्म परिष्करण का प्रभाव दिखता है। संत साहित्य में विशेषकर मनोविकारों को त्यागने का संदेश है। संतों के अनुसार सांसारिक सुख-सुविधाओं के प्रति अत्यधिक मनुष्य को सत्य एवं आध्यात्मिकता से दूर करता है।
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Pages:125-127
How to cite this article:
महिपाल सिंह
"मध्यकालीन संत साहित्यरू त्याग और संगत की महत्ता". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 125-127
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