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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
सुदामा पांडेय 'धूमिल' की कविता 'मोचीराम' और श्रम का सौंदर्यशास्त्र: एक विश्लेषण
Authors
दुर्गेश पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी
Abstract
सन् 1947 में भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त हुई परंतु देश की आम जनता, विशेषकर शोषित, वंचित,पीड़ित और श्रमजीवी वर्ग ने जो आजादी के स्वप्न देखे थे, वे शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गए। तत्कालीन समाजवाद का ढांचा, पंचवर्षीय योजनाएँ और लोकतान्त्रिक संस्थाएँ समतामूलक समाज की स्थापना करने में पूर्णतः विफल रहीं। विषमता की खाई घटने के बजाय और बढ़ी। देश का किसान, मजदूर और फुटपाथ पर बैठकर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाला आम आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा। राजनीति में वातानुकूलित कमरों के भीतर बैठकर जो नीतियां बनाई जा रही थीं, उनका सड़क के खुरदरे यथार्थ से कोई सीधा संबंध नहीं था। इसी ऐतिहासिक और सामाजिक अंतर्विरोधों के बीच 1960 के दशक के बाद हिंदी साहित्य में 'साठोत्तरी कविता' या 'समकालीन जनवादी कविता' का आंदोलन तीव्र हुआ। यह आंदोलन रोमानी कल्पनाओं, आध्यात्मिक रहस्यों, छायावादी सुकोमलता और अज्ञेयवादी व्यक्तिवाद के विरुद्ध एक तरह का काव्यात्मक विद्रोह था। इस विद्रोह के सबसे प्रखर, तीखे, आक्रामक और बेबाक कवि बनकर उभरे-'धूमिल'
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Pages:138-141
How to cite this article:
दुर्गेश पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र मणि त्रिपाठी "सुदामा पांडेय 'धूमिल' की कविता 'मोचीराम' और श्रम का सौंदर्यशास्त्र: एक विश्लेषण". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 138-141
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