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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
प्रसाद और भारतबोध: ऐतिहासिक चेतना एवं सांस्कृतिक अस्मिता का अनुसंधान
Authors
आलोक मिश्र
Abstract
भारतीय साहित्य के आधुनिक कालखंड में जयशंकर प्रसाद एक ऐसे युगद्रष्टा रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से विस्मृत भारतीय अस्मिता को पुनः परिभाषित करने का महती कार्य संपन्न किया है। उनका रचना संसार उस समय आकार ले रहा था जब भारत औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ आत्म-विस्मृति के गहन अंधकार में डूबा था। प्रसाद का श्भारतबोधश् केवल भौगोलिक सीमाओं का विवरण मात्र नहीं है अपितु यह इस देश की सांस्कृतिक आत्मा और ऐतिहासिक गौरव का जीवंत साक्षात्कार है। उन्होंने अपने नाटकों और कहानियों के माध्यम से इतिहास के सूखे ढाँचे में राष्ट्रीयता और मानवतावाद के प्राण फूँककर उसे समकालीन समाज के लिए प्रासंगिक बना दिया। उनके साहित्य में वर्णित भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी जड़ों की ओर लौटकर भविष्य के निर्माण का स्वप्न देखता है। प्रसाद की दृष्टि में राष्ट्रबोध केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है वरन् इसमें सांस्कृतिक वैभव का गहन भाव भी पूर्णतः सम्मिलित है। उन्होंने मौर्य और गुप्त काल की पृष्ठभूमि को इसलिए चुना क्योंकि यह कालखंड भारत की राजनीतिक एकता और सांस्कृतिक उत्कर्ष का चरम था।
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Pages:152-154
How to cite this article:
आलोक मिश्र "प्रसाद और भारतबोध: ऐतिहासिक चेतना एवं सांस्कृतिक अस्मिता का अनुसंधान". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 152-154

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प्रसाद और भारतबोध: ऐतिहासिक चेतना एवं सांस्कृतिक अस्मिता का अनुसंधान | International Journal of Hindi Research