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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
‘झूठा-सच’ में वर्णित सामाजिक चेतना (वैवाहिक जीवन की विसंगतियों के संदर्भ में)
Authors
डॉ0 अनुपाल
Abstract
‘झूठा-सच’ हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। इसे विभाजन की त्रासदी का वास्तविक दस्तावेज कहा जा सकता है। उससे संबंधित घटनाओं का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है. पर साथ ही उपन्यास में वर्णित सामाजिक पक्ष भी उतना ही सबल है। उपन्यास विभाजन के कुछ वर्षों पहले तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के कुछ वर्ष पश्चात् की घटनाओं पर आधारित है। साथ ही यशपाल ने समाज की ज्वलंत समस्याओं को भी उठाया है। सामाजिक समस्याओं के अंतर्गत वैवाहिक जीवन की विसंगतियों, प्रेमविवाह, शिक्षा, नारी स्वातन्त्र्ाय, साम्प्रदायिकता, प्रेम संबंध, बलात्कार, शरणार्थियों की समस्या, दूषित राजनैतिक वातावरण, पुरुषों की मानसिकता इत्यादि का अत्यन्त विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है। परन्तु वैवाहिक जीवन की विसंगतियों को मुख्य रूप से सामने लाना प्रस्तुत शोध लेख का उद्देश्य है। एक साहित्यकार के रूप में यशपाल की उड़ान भविष्य की ओर पूरी जागरूकता और निष्ठा के साथ है। झूठा सब में वर्णित वैवाहिक जीवन की विसंगतियाँ काल सापेक्ष है। उनका ज्वलंत रूप वर्तमान समाज में विद्यमान है। आज के समाज में कोई न कोई सूचना इससे संबंधित समाचार पत्रों, दूरदर्शन में मिल जाती है। दहेज के लिए प्रताड़ित स्त्रियों द्वारा आत्महत्या करना, अवैध संबंधों के कारण पति-पत्नी में मनमुटाव, हत्याएँ आदि सूचनाओं से समाचार पत्र पटे रहते हैं। यह यशपाल के अनुभव और दूरदृष्टि का ही परिणाम है, जो उन्होंने आने वाले रूप की ज्वलंत समस्याओं को इतने वर्ष पहले विस्तृत रूप से वर्णित किया और भविष्य दृष्टा की तरह उनका समाधान करने का प्रयत्न भी किया।
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Pages:161-163
How to cite this article:
डॉ0 अनुपाल "‘झूठा-सच’ में वर्णित सामाजिक चेतना (वैवाहिक जीवन की विसंगतियों के संदर्भ में)". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 161-163
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