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VOL. 12, ISSUE 3 (2026)
रांगेय राघव के कथा साहित्य में भू काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में स्थान संसाधन और हाशिए का मनोविज्ञान
Authors
चन्द्रभान मीना
Abstract
प्रस्तुत शोध-पत्र रांगेय राघव के कथा-साहित्य में स्थान, भूगोल, संसाधन और सामाजिक संबंधों के पारस्परिक संबंध का अध्ययन करता है। विश्लेषण के लिए मुख्यतः उपन्यास कब तक पुकारूँ तथा कहानी ‘गदल’ को केंद्र में रखा गया है। लेख का प्रमुख प्रश्न यह है कि साहित्यिक ‘स्थान’ किस प्रकार केवल भौगोलिक पृष्ठभूमि न रहकर पात्रों की आजीविका, सामाजिक प्रतिष्ठा, निवास, गतिशीलता, पारिवारिक संबंध और आत्मबोध को प्रभावित करता है। अध्ययन में ‘भू-काव्यशास्त्र एवं जियोपोएटिक्स’, हेनरी लेफ़ेब्वर की स्थान-उत्पादन की अवधारणा और पारिस्थितिक स्त्रीवाद को आलोचनात्मक उपकरण के रूप में उपयोग किया गया है। इन सिद्धांतों को रांगेय राघव की घोषित वैचारिकी मानने के बजाय समकालीन पुनर्पाठ की पद्धति के रूप में ग्रहण किया गया है। कब तक पुकारूँ में करनट समुदाय की अस्थिर सामाजिक स्थिति, निवास और संसाधनों से दूरी तथा सुखराम की पहचान-संबंधी आकांक्षा को स्थानिक असुरक्षा के साथ पढ़ा गया है। ‘गदल’ में घर, परिवार, देह, मर्यादा और स्त्री की इच्छा के बीच का तनाव यह दिखाता है कि स्थान निजी होने के साथ-साथ सामाजिक नियंत्रण का माध्यम भी हो सकता है। लेख का निष्कर्ष यह है कि रांगेय राघव के कथा-संसार में भूगोल और सामाजिक सत्ता का संबंध परस्पर निर्मित है; फिर भी पात्र अपने परिवेश के निष्क्रिय उत्पाद नहीं हैं, बल्कि वे संघर्ष, निर्णय और प्रतिरोध के माध्यम से स्थान के अर्थ को बदलने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार रांगेय राघव का साहित्य स्थानिकता, सामाजिक असमानता और हाशिए के अनुभव को एक साथ पढ़ने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
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Pages:197-199
How to cite this article:
चन्द्रभान मीना
"रांगेय राघव के कथा साहित्य में भू काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में स्थान संसाधन और हाशिए का मनोविज्ञान". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 3, 2026, Pages 197-199
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