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VOL. 12, ISSUE 4 (2026)
‘खिलेगा तो देखेंगे’ में विनोद कुमार शुक्ल की सृजनात्मक चेतना और जीवन-दर्शन
Authors
कृष्णा राम चौहान, डॉ. कुसुमलता प्रजापति
Abstract
प्रस्तुत शोधपत्र विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ में अभिव्यक्त सृजनात्मक चेतना और जीवन-दर्शन का अध्ययन करता है। इसका प्रमुख उद्देश्य कृति में निहित अस्तित्वगत चिंतन, मानवीय संवेदना और पारिस्थितिकीय चेतना के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करना है। अध्ययन गुणात्मक एवं व्याख्यात्मक प्रकृति का है, जिसमें पाठ-विश्लेषण और अर्थमीमांसात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से भाषा, बिंबों, प्रतीकों तथा कथ्य-संरचना का विवेचन किया गया है। पारिस्थितिकीय आलोचना इस विवेचन का प्रमुख सैद्धांतिक आधार है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि शुक्ल की सहज भाषा, सूक्ष्म निरीक्षण और कल्पनाशीलता दैनिक जीवन के साधारण अनुभवों को गहन दार्शनिक अर्थ प्रदान करते हैं। कृति में प्रकृति मानवीय चेतना, आत्मबोध और जीवनानुभवों की सक्रिय सहभागी के रूप में उपस्थित है। आशा, प्रतीक्षा, धैर्य, आत्मीय संबंध और आंतरिक संतोष जीवन की सार्थकता के महत्वपूर्ण आधार बनते हैं। मनुष्य तथा गैर-मानवीय जगत की परस्पर निर्भरता का चित्रण प्रकृति के प्रति करुणा, सह-अस्तित्व और नैतिक उत्तरदायित्व को महत्व देता है। आधुनिक जीवन की यांत्रिकता, उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों और प्रकृति से बढ़ती दूरी के संदर्भ में शुक्ल की जीवन-दृष्टि संवेदनशील तथा संतुलित जीवन की संभावनाएँ प्रस्तुत करती है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि उनकी सृजनात्मकता में साहित्यिक सौंदर्य, अस्तित्व की खोज और पर्यावरणीय संवेदनशीलता परस्पर संबद्ध हैं। इस प्रकार, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंधों तथा साझा जीवन की गरिमा को प्रतिष्ठित करने वाली कृति के रूप में सामने आती है।
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Pages:56-60
How to cite this article:
कृष्णा राम चौहान, डॉ. कुसुमलता प्रजापति "‘खिलेगा तो देखेंगे’ में विनोद कुमार शुक्ल की सृजनात्मक चेतना और जीवन-दर्शन". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 4, 2026, Pages 56-60
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